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रविवार, अगस्त 07, 2011

लैपटॉप की दुनिया


हर रोज
अपने लैपटॉप से मैं नयी दुनिया देखता हूँ |
जहाँ तमाम दुनिया, 
एक स्क्रीन पर है,
जो चाहो वो कर सकते हो,
जो चाहे वो देख सकते हो
बस माउस को दिशा देनी होती है
क्लिक करो और आपके मन की चीजें 
स्क्रीन पर |
अगर नेट और मौसम का साथ रहा तो 
फिर क्या,
चीजें पल भर में आपके पास |
आप अपनी मनपसंद चीजें 
छोटे कमरे में बैठ कर 
चाय, बिस्कुट के साथ  
देख सकते हैं |
चंद पैसों में आप पूरी कृत्रिम दुनिया 
घर बैठे देख सकते हैं|
चाहे वो आगरा का ताजमहल हो
या फिर जयपुर का हवामहल, 
हर महल आपके पहल पर है|
झरनों की सरसराहट हो या
पक्षियों की चहचहाहट,
सभी के ऊपर एक क्लिक करने की देर है|
आप की मुस्कुराहट इसके कीबोर्ड के कमांड पर है| 
इंटर देंगे तो आपकी मुस्कुराहट प्रोसेस होने लगेगी|   
हर खुशी को आप माई डोकुमेंट्स या डेस्कटॉप या फिर किसी भी 
ड्राइव में सेभ कर सकते है |
रिफ्रेश देने पर रुका काम भी होने लगेगा|     
मगर क्या इस वास्तविक जीवन में कोई
रिफ्रेश बटन नहीं,
जिससे हर दुःख, दर्द और तकलीफ मिट जातें |
हर रोज मेरा रू-ब-रू अपने लैपटॉप से होता है,
अलग अलग खोज के साथ|


(कलकत्ता नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति से प्रकाशित पत्रिका "स्वर्णिमा 2011" में तृतीय पुरस्कार से सम्मानित )

रविवार, जुलाई 10, 2011

कुछ नहीं फिलहाल

मेरे जेब में दस के नोट 
और बाजार में महँगाई की चोट,
काँप जाता हूँ कभी नींद में,
तो कभी जागते हुए |

कहीं आगे बढ़ने की भीड़ है तो कहीं 
पीछे छूटने का भय, 
हर बार मैं भीड़ और खालीपन के 
बीच का रह जाता हूँ|

मेरे सिर पर खुला आकाश पर फिर भी मैं
उसे छू नहीं सकता ,
 चाह है नदी को देखने की पर, 
उस पार जा नहीं सकता |

लोगों के भीड़ में मैं सिर्फ ,
एक सिर,दो हाँथ और दो पाँव का इंसान हूँ 
चारों ओर से  एक भीड़ का शिकार हूँ 
और कुछ नहीं |

अजनबियों और अज्ञात मानवों की मण्डली 
हर ओर है, 
मित्र लायक कौन है! 
ये कहना चावल से कंक्कड़ निकालने जैसा है|

बिजली की चमक से 
कौन खुश है और कौन उदास
इस बात का पता लगाना 
बादलों से दोस्ती करना जैसा होगा |

एक अतृप्त मानव
को ओश की बूँद चाहिए या फिर
साधारण पानी की बूँद ,
इससे बेहतर 
कश्म कश और कुछ नहीं फिलहाल | 

तुम उदार बन सकते हो

तुम उदार बन सकते हो,
बस अपने पास आए गरीब को 
दो पैसे देकर
ज़माना महँगाई का है 
इतना तो सोचना ही पड़ेगा 
मगर अपने लिए नहीं...
लोग तरह तरह के पाठ
पढ़ाएंगे
अफ़सोस, तुम्हारे पास 
अनपढ़ होने का बहाना रहेगा |
कोई दो पैसे देकर उदार है तो कोई
चार पैसे...
हर रोज तुम्हे तुम्हारा जमीर  
एक ही बात कहेगा 
कल की अपेक्षा 
आज तुमने ज्यादा उदारता दिखाई,
कुछ लोग ऐसे मिलेंगे 
जिन्हें आभास तक नहीं इसका |
मगर तुम्हे 
उदारता के झोले में कभी
दो, कभी चार और कभी उससे भी ज्यादा डालना पड़ेगा |

 ( कलकत्ता नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति से प्रकाशित पत्रिका "स्वर्णिमा 2011" में प्रकाशित    ) 

रेत के ढेर

सागर के किनारे रहते 
रेत के ढेर |
एक अलग ही सौन्दैर्य छिपा रहता उसमे |
कोई अपना नाम लिखता, 
तो कोई अपना और अपने साथी का एक साथ ,
कोई अपने बिछड़े साथी का,
कोई अपने बेटे का,
तो कोई ऐसा भी होता,
जो कला के अलग-अलग रंग बिखेरता
उस रेत पर,
अफ़सोस...
जी हाँ अफ़सोस,
एक लहर 
सारे सौंदर्य,रिश्ते नाते और कला 
को अपना रूप देकर चला जाता
और फिर आता 
और फिर जाता...

बारिश से डरता नहीं था मैं

बारिश से डरता नहीं था मैं
मगर इस बार 
इस बारिश ने मुझे भिगोया
कभी दाहिने कंधे को
कभी बाएं कंधे को
कभी दाहिने पैर को
तो कभी बाएं...
हर बार एक भीगा एहसास 
मुझे कुछ याद दिलाता
कि मेरे सिर पर एक छाता है 
खरीदने से पहले मैंने 
गलती की, मैं भूल गया पूछना की 
क्या ये बारिश में मुझे बचाएगा ?
और अंत में 
छाते ने अपना वादा नहीं निभाया |

घुटन

घुटन उस अन्धे कुँए, गहरी खाई,
लम्बी सुरंग और ऊँची चोटी 
जैसी है, 
जहाँ सिर्फ और सिर्फ बेचैन मानव के 
भीड़ है |
देखना चाहो तो अँधेरा है,
झाँकना चाहो तो गहरा है,
मापना चाहो तो लम्बी है ,
और चढ़ना चाहो तो ऊँची है |

उफ ये बारिश...


अब के बरस बारिश की बूंदे
बाज़ार के चावल से महंगी है |
भीगना चाहो या न चाहो, 
बीमार पड़ने पर खर्चे का डर बना ही रहेगा |
अब तो सारा शहर महंगाई में डूबेगा,
हर कोई बारिश से भीगेगा,
गरीबी या अमीरी से इसका 
कोई नाता नहीं,
हर जाति और धर्म को भिगोयेगा |
उफ ये बारिश... 






फ़साने...अफ़साने...

मैं ग़ालिब नहीं, न हूँ मीर, 
फिर भी मैं लिखूंगा 
फ़साने...अफ़साने... जो भी हो|
फूलों की खुशबू से लेकर दिए की रौशनी तक,
जिससे रोशन है घर भी और शायरी भी |
यादों की जरूरत नहीं... 
ख़्वाबों की जागीर नहीं...
न है मिलकियत खजानों की..
महरूम हूँ मै इनसे,
बस इंतज़ार है...बस इंतज़ार है...  
चिरागों से लौ चुराने की,
कि मै भी रौशन हो जाऊं और मेरी शायरी भी |

शिकायत

धूल भी है जमीं पर 
ये पाँव भी है जमीं पर 
तो फिर आसमां की क्या जरुरत !
कहते है ग़ालिब के बाद के शायर कि
आसमां में छिपे चाँद की क्या जरुरत !
जिन हवाओं ने इन सुर्ख आँखों में 
दिए धूल के बारीक कण 
उन हवाओं की क्या जरुरत !
राहों में चलने वाले मुसाफिर
भटकने के बाद कहते हैं         
इन राहों की क्या जरुरत !
कड़ी धूप में तिलमिलाते बदन  
और जुबां से एक सच कि 
इस धूप की क्या जरूरत !
वो खुसी के पल और उस पल के बाद बहते आंसू   
तो इन आंसुओं की क्या जरूरत !
हर जंग में लड़ते जवान 
हर दुश्मन से लड़ते लड़ते शहीद होते जवान 
तो उस जंग की क्या जरूरत !
उस तूफानी रात में उजड़ते लाखों झोपड़े
और बेसहारा होते लाखों गरीब लोग
तो उस तूफ़ान की क्या जरूरत !
बाढ़ से बहते कई गाँव और बर्बाद होते किसान 
बह जाते सारे छोटे-छोटे सपने
बाढ़ के साथ 
बह जाते एक समय की सुखी रोटी और प्याज 
उस बाढ़ के साथ 
फिर उस बाढ़ की क्या जरूरत !
गरीबी और गरीबों के हक़ को लेकर किये गए 
वादें जो पूरे नहीं होते 
उन वादों की क्या जरूरत !
.

शनिवार, मई 14, 2011

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की रचना "गीतान्जली" के कुछ काव्य अंशो का अनुवाद

"एक ऐसा समय जब मस्तिष्क में कोई डर नहीं रहता है और सिर तना हुआ होता है, जहाँ ज्ञान पर कोई दवाब नहीं वह बिलकुल स्वतंत्र होता है जहाँ विश्व को छोटी छोटी घर जैसी दीवारें खण्डों में विभाजित नहीं करती, जहाँ शब्दों में अटूट सच्चाई रहती है, जहाँ बाहें बिना थके और प्रयत्नशील रूप से खुद को पूर्णता की और फैलाती है जहाँ कोई साफ़ वजह भी सुनसान रेगिस्तान में अर्थहीन आदत के रेतों के बीच अपना रास्ता नहीं खोती, जहाँ दिमाग हमेशा के लिए तुम्हारे द्वारा आगे बढ़ना चाहता है -एक विस्तृत सोच और कार्य से | उस स्वतंत्र स्वर्ग में, मेरे पिता, हमारे देश को जागने दो...|

(नोट : रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की रचना "गीतान्जली" के कुछ काव्य अंशो का अनुवाद यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है...|)

शनिवार, अप्रैल 23, 2011

किताब और विचार

कहने को तो मै किताबो से मन बहलाता हूँ ,
पर किसी ने मुझसे ये नहीं पूछा
कि क्या मै किताबों का गुलाम हूँ !
जब लोग ये पूछना शुरू करेंगे तो...
शायद किताबो के पन्ने पुराने हो चुके होंगे
तब उन्हें ये बात समझ आ जाएगी कि
काश... इसे पहले पढ़ लेता
तो आज मै भी और मेरे विचार भी
इन्ही किताबी पन्नो की तरह
मूल हो जाते
किताबों के पन्नों और विचारों में
सिर्फ इतना ही अंतर है कि,
पन्ने किताबों कि शोभा बढ़ाते है
तो विचार व्यक्तित्व की.
अब सवाल यह है कि
आप किसे चुनते है ?
अगर किताब के पन्नो पर दिल लगाते हैं तो
विचार बनते देर न लगेगी....

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

आज हमारे आस पास जो भी अच्छा बुरा है उसे हम खुले आखों से केवल देखते है मगर उसे और भी अलग और रचनात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है उसके लिए आपको साहित्य में एक बार तो झांकना ही पड़ेगा ताकि कुछ और अनोखा और नया समाज के लिए तैयार हो सके...

रविवार, दिसंबर 19, 2010

सिफारिश


हवाओं ने आज साजिश कि है
घटाओं ने फिर से बारिश कि है
यूँ तो लग रहा था
मोहब्बत का आलम शुरू होने को है
मगर ये किसे पता था कि
किसी ने न्याय पर अन्याय कि
सिफारिश कि है |

कोई चिल्लाता रहा
कोई धीरे -धीरे बुलाता रहा |
टूटे पाँव किसी ने फरियाद कि है
जख्मी हाथ पर किसी ने वार कि है
उसे जल्लाद कहूं  या नादान
आज हर किसी के जेहन में
ऐसी बात हरकत की है |

खामोशियों से किसने दोस्ती की है
टूट जाने दो आज हर बंदिश को
जल जाने दो हरेक रंजिश को
न रहें दुश्मनी के तार
ख़ुशी है इस बात की
किसी ने तो इसकी मुखालफत कि है |

बंद दीवारों में रहनेवालों ने
आज चुप्पी तोड़ी है |
हो रहें जुल्म कि
झूठी तिजोरी लूटी है |
हर कोई जानता है
वो लुटेरा नहीं,
मगर अन्याय कि कलाई उसने मरोड़ी है |

उसे मालूम है वो शायर नहीं,
उसे मालूम है वो लेखक नहीं,
उसे मालूम है वो कवि भी नहीं,
तो उसने स्याह माँगा
ये बात आज खली है |
सादे कागज़ पे ये बात किसने लिखी ?
मुझे मालूम नहीं,
मगर हाँ किसी ने आज इंसान की
सिफारिश कि है |

गूंगे को  आज आवाज मिली,
लंगड़े को आज बैशाखी,
अंधे को रौशनी की आश
तो बेसहारे को सहारा का एहसास |
हर तरफ एक नयी उल्लास  कि गुलाल बिखरी है
किसी ने इस बात कि अफरातफरी की  है
मगर बात तय है किसी ने इसकी सिफारिश की  है...

सोमवार, दिसंबर 13, 2010

कविता- नए दौर में

छपने के बाद कविता,
कविता नहीं रह जाती है,
उसके शब्द बोल उठते हैं |
प्रत्येक मात्रा अपने स्थान से उठकर
कविता का बनकर रह जाता है |

ये तो छपने छपने की बातें है |
तब यही कविता अनेक गुल खिलाती है |
किसी को हरा, पीला, लाल कर देती है,
रोते हुए को हंसा भी देती है
हँसते हुए को ...

हर चौराहे से झांक उठती है ये कविता,
किसी भी सम्मलेन या संगोष्ठी में 
हाथों कि शोभा बन जाती है |
नवयुवकों के डायरी और प्रेमिकाओं के 
हाथों में दिखती है. यही कविता  |
हर शमा को बांधती है ये कविता,
तो कभी मंच कि शोभा बढाती है ये कविता |

फूटपाथ पर रहने वाले गरीब, महानगर में बसे हर लोगों
के हर रूप को बयां करती है ये कविता |
आखिर हर, कवि के बीच 
आलोचना का विषय है ये कविता |

गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

कवि का अंतर्मन

आज से मैंने पढना और लिखना छोड़ दिया
क्योंकि, अब वो किताब ही छपनी बंद हो गई
जिसे कभी मैं 
हर दिन ५ से १० पन्ने कर के पढता था |
तब मैं  एक विद्यार्थी के साथ साथ
एक कवि और लेखक बनना चाहता था,
अब भी, लेकिन मजबूर हूँ की
कहीं मैं भी उन लेखकों या कवियों 
की तरह न बन जाऊं 
जिन्हें बहुत कम ही लोग 
पढना पसंद करते है |
 मुझे ऐसा लगता है कि
या तो अच्छे लेखक नहीं रहें
या फि, मैं ही उन लेखकों के 
छपे किताबों से दूर हो गया हूँ
शायद...

अब उस लाइब्रेरी में ऐसी कोई किताबें   
नहीं 
जिसे मेरे हाथ आगे बढ़कर
उठा  ले 
अब तो उन किताबों की जगह
या तो धूल पड़े मिलते है
या फिर कुछ ऐसी किताबें जिसे मेरी सोच
स्वीकार नहीं करती

महानगर के उन सभी लाइब्रेरी का चक्कर मार आता हूँ मगर
उनमे या तो रट्टे मारने वाले विद्यार्थी नजर आते है
या फिर नए नए उभरते कवि या लेखक |

जब कभी किसी कवि सम्मलेन या किसी संगोष्ठी 
में जाता हूँ तो 
वही सारा कुछ सुनने को मिलते है
जिसे बहुत कम ही लोग पसंद करते है
मगर उस मंच को देख सभी खामोश है |
अब आप लोगों को समझ में आ गया होगा कि
क्यों, मै इनमे शामिल नहीं होना चाहता |

मगर 
ये सारा कुछ लिखने के बाद 
मुझे कोई नहीं छोड़ेगा...
अब तो मै भी दिखूंगा उन सभी लाइब्रेरी में 
सजे कुछ किताबों क बीच...

मंगलवार, दिसंबर 07, 2010

शब्द

मै ... 
कविता की एक कड़ी हूँ
जो समय के साथ
और मजबूत होता जा रहा है |
समाज का हर एक तबका
मुझे घूर रहा है |
कुछ लिखने क लिए ,
मै विवश हूँ |
न जाने क्यों मेरे हाथ कॉपते है ,
उस सच्चाई पर 
जो मेरा पीछा कर रही है
शब्द चुनता  हूँ ,
शब्द फैंकता हूँ,
अब मेरे चारो और शब्दों का एक जाल है |
इन शब्दों में समाज की एक त्रासदी है |
और शायद मेरे लिखने की भी,
सभी सच कहते है 
शब्द बोलते है
जो आज गूंगा है |
वे आज शब्दों के शक्ल 
में जिन्दा है |
शब्द उन्हें नचा रहा है
और वे  नाच रहें है |

शनिवार, दिसंबर 04, 2010

जब कभी मुझे ऐसा लगता है की दिशाएं अनुकूल है मेरे लिए तब मैं अच्छे  काम करता हूँ और जब कुछ ऐसा महसूस होता है की मेरे अन्दर काफी अन्दर तक विवेकानंद, टैगौर, महात्मा गाँधी जैसे महापुरुष के विचार जागने लगे  या फिर साहित्यकारों जैसे प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, अगेये  ,पन्त आदि के सोच मुझे सोचने पर मजबूर करने लगते हैं , तब मैं कुछ नहीं करता बस एक दार्शनिक का लिबाज़ धारण कर लेता हूँ...

इस डर को दफ़न करना बेहतर होगा...

कोई इंसान किस हद तक डर सकता है
अपने द्वारा लिए गए निर्णय से |
बात है अकेले की
कोई कितना भी दिमाग लगा ले
मगर वो सही होगा
इस बात की कोई फरमान नहीं |
हाँ! मै एक बात जरुर कहूँगा की
गलत निर्णय हमेशा इंसान को
ऐसे तथ्यों के बारे में भी सोचने पर मजबूर कर देगा
जिसे वो कभी दिवा स्वप्न में भी नहीं देखा होगा |

पर उस समय वो अच्छा नहीं,
कुछ उल्टा-पुल्टा ही सोचेगा
अगर वो दार्शनिक भी हुआ तो
किसी से सलह लेकर
संत अनुयायी तो बिलकुल नहीं बन पायेगा...
कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि
"दाता राम" कहने वाले ही सुख भोगते हैं |
मेरा इशारा डर के कारण आने वाले उल-जलूल ख्यालों से है |

मगर फिर हालत ऐसी हो जाएगी की
पानी का स्वाद भी फीका लगने लगेगा
और अगर डर के कारण...
जल जो जीवन है वो भी मन को तृप्त न कर पाए
तब तो, इस डर को दफ़न करना हीं होगा...





संकल्प

क्या, बारिश ने तुम्हे भिगोया है ?
नहीं ! तो अपने कपडे क्यों उतार रहे हो,
अरे भाई, वर्षा का जल है...
कोई विष तो नहीं
तो, इसे पी क्यों नहीं रहें हो ?

तुम डरपोक नहीं हो, मुझे पता है
पर तुम साहसी भी तो नहीं,
कायरता के लेप क्यों लगाये हो ?
किसने डराया है तुम्हे?
अगर किसी ने नहीं , तो फिर काँप क्यों रहें हो ?

आग को तो तुम छू नहीं सकते,
तो फिर तुम्हारे हाथ क्यों सूजे हुए है ?
तुमने दलदल की और कदम नहीं बढ़ाये तो फिर
ये कीचड़ कहाँ से आए...

जवाब दो अब खुद को...कि तुम्हारा संकल्प कैसे टूट गया ?

चल रहा समय है

चल  रहा  समय है
चल रहा है मानव
एक अनजान पथ पर बढ़ रहा हूँ मै
चारो तरफ उजाले है
फिर भी, डर रहा हू मै

मुझे तो आगे बढ़ना है
गहन अंधेरों से गुजरना है
दृढ संकल्प है मेरे
फिर भी मन क्यों डरे ,

सोचता हूँ ये हर बार
डरता हूँ बार-बार 
कोई समझाए इसे
कोई बताये इसे
रास्ते है अनेक
बस, बढ़ते चल तू सचेत...

 निराशाओं के कड़े धूप है जरूर
मगर इससे तू क्यों डरे
दृढ संकल्प है तेरे
फिर क्यों तू थामे...
चल  रहा  समय है
चल रहा है मानव...

मेरा प्रेम

मेरा प्रेम फूल नहीं,
सुगंध है...
हर रोज जिसे मै देखता नहीं
महसूस करता हूँ ,
वो मेरे साथ नहीं,  मेरे पास नहीं
क्योंकि, मेरा प्रेम फूल नहीं सुगंध है
  जब भी उपवन से गुजरता हूँ
उसे पाता ही नहीं
फूल तो बहुत है 
पर भाता ही नहीं
क्योंकि,  दीवार है उन पेड़ों के इर्द-गिर्द 
जिनपर मेरे हाथ 
पहुँचते नहीं ,क्योंकि ...
मेरा प्रेम फूल नहीं सुगंध है...



अर्थपूर्ण आवाज़

बिना मतलब के शोर करने वाले लोग मुझसे दूर रहें, 
क्योंकि मै इस ''भीड़'' में हूँ जरुर
मगर एक बात
हाँ, एक बात
मै दिल और दिमाग
जी नहीं-
केवल दिमाग के आवाज़ से साफ़ कर देना चाहता हूँ
कि,  मै इस ''भीड़'' के साथ नहीं
मेरी आवाज़ शायद आपको सुनाई  न दे,
और न ही समझ में आए ?


लेकिन ,अपने आस पास के बेमत्लाबी शोर से उभरकर,
 उससे निकलकर मुझे सुने,
मै समझ में आऊंगा,
और तब आपकी भीड़ भी अर्थपूर्ण बनेगी...

दर्शन की बातें

एक लम्बे समय के बाद जब 
कोई मुझसे पूछता है 
क्या तुम वही हो, जिसने कल के अख़बार को
अपना नाम दिया था?

मै कुछ देर के लिए खामोश हो जाता हूँ
और सोचने लगता हूँ कि
शायद मैंने ठीक नहीं किया
अगर मुझे वैसा करना ही था तो
मुझे कुछ और करना चाहिए था !
पर मै क्या करता
औरो कि तरह मै भी दर्शन को समझने लगा था 
और मैंने वही किया , जो  एक संपादक को करना चाहिए,
तब मै समझ जाता हूँ कि
बोलने वाले तो तब तक  बोलेंगे 
जब तक वो भी ,
इस दर्शन के  भक्त न बन जाये...