जरूरी है
चुप चाप बैठना ।
बिना कुछ सोचे
शांत मन
शांत जल जैसा ।
हर बार शोर जरूरी नहीं होता
तेज कदमों की
भी जरूरत नहीं होती ।
जरूरी होता
मंद मुस्कान
और
कुर्सी पर पीठ को आराम देना ।
हल्की हवा आपको राहत देती है
उस नीले आकाश को निहारने के लिए ।
पीछे से आती एक तेज ध्वनि
सब कुछ
ख़राब कर देती है
जैसे
किसी इन्द्रधनुष का ओझल हो जाना ।